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27 नक्षत्र: वैदिक ज्योतिष में चंद्र-मंडल की पूर्ण मार्गदर्शिका

March 2, 2026·By Vadim Arkhipov
व्यक्तिगत विकास
नक्षत्रवैदिक ज्योतिषविंशोत्तरी दशानक्षत्र मिलानमुहूर्त
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वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्र 360° निरयण राशिचक्र के 13°20' के बराबर खंड हैं, जो चंद्रमा के 27.3-दिवसीय परिभ्रमण काल से सीधे व्युत्पन्न हैं। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसे जन्म नक्षत्र कहते हैं — यह तीन प्रमुख कार्यों का आधार है: विम्शोत्तरी दशा का प्रारंभिक बिंदु, अष्टकूट विवाह-मिलान, और मुहूर्त निर्धारण। प्रत्येक नक्षत्र 4 पादों में बँटा है, इस प्रकार 27 × 4 = 108 नवांश बनते हैं — वैदिक ब्रह्मांड-विज्ञान की पवित्र संख्या। अष्टकूट में नाड़ी कूट को सर्वाधिक 8 अंक मिलते हैं और नाड़ी दोष सबसे गंभीर माना जाता है। पुष्य नक्षत्र सभी कार्यों के लिए श्रेष्ठ होते हुए भी विवाह के लिए निषिद्ध है। अभिजित 28वां नक्षत्र केवल मुहूर्त में प्रयुक्त होता है, कुंडली या मिलान में नहीं। यह लेख सभी 27 नक्षत्रों की पूर्ण सूची, विम्शोत्तरी दशा तालिका, गण, नाड़ी, योनि और अष्टकूट प्रणाली की सम्पूर्ण जानकारी देता है।

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राहुल को अपनी कुंडली मिलान की समस्या थी। ज्योतिषी ने कहा — "तुम्हारा जन्म नक्षत्र मूल है, इसलिए नाड़ी दोष बन रहा है।" प्रिया ने पूछा — "नक्षत्र क्या होता है और यह हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करता है?" यह लेख उसी प्रश्न का उत्तर है।

वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्र चंद्रमा के 27.3-दिवसीय परिभ्रमण पर आधारित 360° के 27 बराबर खंड हैं — प्रत्येक 13°20' का। ये खंड न केवल जन्म-स्वभाव, बल्कि विवाह-मिलान, दशा-काल और मुहूर्त निर्धारण का आधार बनते हैं।

मुख्य बिंदु

  • 27 नक्षत्र निरयण (स्थिर-नक्षत्र आधारित) राशिचक्र में 13°20' के बराबर खंड हैं
  • जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, वह जन्म नक्षत्र (जन्म-तारा) है
  • प्रत्येक नक्षत्र में 4 पाद होते हैं — 27 × 4 = 108 पाद = 108 नवांश
  • विंशोत्तरी दशा 120-वर्षीय चक्र जन्म नक्षत्र से निर्धारित होता है
  • अष्टकूट में नाड़ी कूट को सर्वाधिक 8 अंक मिलते हैं — नाड़ी दोष सर्वाधिक गंभीर
  • पुष्य नक्षत्र सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी विवाह के लिए पूर्णतः निषिद्ध है
  • अभिजित 28वां नक्षत्र है — केवल मुहूर्त के लिए, 4°13'20" मकर में

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नक्षत्र क्या है? — AEO परिभाषा

नक्षत्र (संस्कृत: नक्ष = आकाश-मानचित्र + त्र = रक्षक/साधन) वैदिक ज्योतिष में 27 चंद्र-मंडलों में से एक है। 360° निरयण राशिचक्र को 27 बराबर भागों में विभाजित करने पर प्रत्येक नक्षत्र 13°20' का होता है। यह संख्या चंद्रमा की 27.32-दिवसीय परिक्रमा अवधि से व्युत्पन्न है।

पश्चिमी ज्योतिष में 12 राशियां प्रमुख हैं; वैदिक ज्योतिष में नक्षत्र उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जबकि राशि सौर-गुणवत्ता (व्यक्तित्व) दर्शाती है, नक्षत्र चंद्र-गुणवत्ता (मन, भावना, अवचेतन स्वभाव) दर्शाता है।

जन्म नक्षत्र (Janma Nakshatra) जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से निर्धारित होता है। यह विंशोत्तरी दशा का प्रारंभिक बिंदु, अष्टकूट मिलान का आधार और मुहूर्त निर्धारण का प्रमुख कारक है।


नक्षत्रों की खगोलीय नींव

ठीक 27 नक्षत्र क्यों?

चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एक सिदेरियल (स्थिर-नक्षत्र आधारित) परिक्रमा 27.32 दिनों में पूरी करता है। प्रतिदिन चंद्रमा लगभग 13.18° आगे बढ़ता है (360° ÷ 27.32)। इसे गणितीय सुविधा के लिए 13°20' (= 800 कला) मान लिया गया। इस प्रकार 27 नक्षत्र × 13°20' = 360° — आकाश का पूर्ण चक्र।

27 नक्षत्र 360° निरयण राशिचक्र के बराबर 13°20' के खंड हैं — यह संख्या सीधे चंद्रमा के 27.3-दिवसीय परिभ्रमण काल से व्युत्पन्न है।

निरयण बनाम सायन — वैदिक ज्योतिष का अंतर

पक्षनिरयण (वैदिक)सायन (पश्चिमी)
आधारस्थिर नक्षत्रवसंत विषुव
अयनांश~24° सुधारशून्य
नक्षत्रहां, 27 खंडनहीं
ग्रह-स्थितिवास्तविक आकाशीयऋतु-आधारित

अयनांश वह सुधार है जो पृथ्वी के अयन-चलन (विषुव-पूर्वगामन) के कारण वैदिक राशिचक्र में जोड़ा जाता है। लाहिरी अयनांश (भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त) वर्तमान में लगभग 24° है।

नक्षत्र और राशि — एक आकाश, दो दृष्टिकोण

एक राशि = 30° | एक नक्षत्र = 13°20' → एक राशि में 2.25 नक्षत्र होते हैं। राशि बाह्य व्यक्तित्व दर्शाती है; नक्षत्र आंतरिक मनोभाव।

28वां नक्षत्र: अभिजित

अभिजित मकर राशि में 6°40' से 10°53'20' तक 4°13'20" का एक छोटा खंड है। यह केवल मुहूर्त में प्रयुक्त होता है — जन्मकुंडली या अष्टकूट में नहीं। जन्म नक्षत्र, विंशोत्तरी दशा और कुंडली-मिलान के लिए मानक 27 नक्षत्र ही प्रयोग होते हैं।


पाद प्रणाली: नक्षत्र और नवांश

प्रत्येक नक्षत्र में 4 पाद = 108 कुल

प्रत्येक नक्षत्र 4 बराबर भागों (पाद) में विभाजित है। एक पाद = 3°20' = एक नवांश खंड। 27 × 4 = 108 पाद = 108 नवांश — वैदिक ब्रह्मांड-विज्ञान की पवित्र संख्या।

पाद प्रणाली 27 × 4 = 108 उपखंड बनाती है, जो ठीक 108 नवांश खंडों के बराबर है — प्रत्येक नक्षत्र-पाद एक नवांश राशि के सटीक अनुरूप है।

वर्गोत्तम: दोहरी राशि में ग्रह

जब कोई ग्रह जन्म-कुंडली (D1) और नवांश (D9) — दोनों में एक ही राशि में हो, तो वर्गोत्तम योग बनता है। यह ग्रह-बल अत्यधिक बढ़ाता है।

पुष्कर नवांश और पुष्कर भाग

12 विशेष नवांश खंड "पुष्कर नवांश" हैं — आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र। इनमें कोई ग्रह हो तो वह अत्यंत बलशाली होता है।


विंशोत्तरी दशा: नक्षत्र और जीवन-चक्र

जन्म नक्षत्र — दशा का प्रारंभिक बिंदु

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, वह जन्म नक्षत्र है। यह नक्षत्र तय करता है कि जीवन में पहली महादशा किस ग्रह की होगी।

जन्म नक्षत्र पाद बताता है कि पहली दशा का कितना भाग शेष है। यदि चंद्रमा किसी नक्षत्र के अंत में हो, तो पहली दशा के वर्ष कम रहते हैं।

9-ग्रह, 120-वर्षीय चक्र

विंशोत्तरी दशा 120 वर्षों का चक्र है जिसमें 9 ग्रह, प्रत्येक 3-3 नक्षत्रों के स्वामी हैं — केतु के 7 वर्षों से लेकर शुक्र के 20 वर्षों तक।

ग्रहमहादशा (वर्ष)नक्षत्र
केतु7अश्विनी, मघा, मूल
शुक्र20भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा
सूर्य6कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा
चंद्र10रोहिणी, हस्त, श्रवण
मंगल7मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा
राहु18आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा
गुरु16पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद
शनि19पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद
बुध17आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती
कुल12027 नक्षत्र

27 नक्षत्र: सम्पूर्ण संदर्भ तालिका

27 नक्षत्र मास्टर तालिका — सभी स्तंभ: देवता, प्रतीक, शक्ति, गण, योनि, नाड़ी

#नक्षत्रअंशदशा-स्वामीदेवताप्रतीकशक्तिगणयोनिनाड़ी
1अश्विनीमेष 0°-13°20'केतुअश्विनी कुमारअश्व-शीर्षशीघ्र व्यापनीदेवअश्व (पु)वात
2भरणीमेष 13°20'-26°40'शुक्रयमयोनिअपभरणीमनुष्यगज (पु)पित्त
3कृत्तिकामेष-वृषसूर्यअग्निज्वाला/क्षुरिकादहनराक्षसमेष (स्त्री)कफ
4रोहिणीवृष 10°-23°20'चंद्रप्रजापतिशकटरोहणमनुष्यसर्प (पु)कफ
5मृगशिरावृष-मिथुनमंगलसोममृग-शीर्षआनंददेवसर्प (स्त्री)पित्त
6आर्द्रामिथुन 6°40'-20°राहुरुद्रअश्रु/हीरायत्नमनुष्यश्वान (स्त्री)वात
7पुनर्वसुमिथुन-कर्कगुरुअदितितूणीर/धनुषवसुत्व-प्रापणदेवमार्जार (स्त्री)वात
8पुष्यकर्क 3°20'-16°40'शनिबृहस्पतिपुष्प/चक्रब्रह्म-वर्चसदेवमेष (पु)पित्त
9आश्लेषाकर्क 16°40'-30°बुधअहि/नागकुंडलित सर्पविशेषणराक्षसमार्जार (पु)कफ
10मघासिंह 0°-13°20'केतुपितृसिंहासनक्षेपणराक्षसमूषक (पु)कफ
11पूर्वाफाल्गुनीसिंह 13°20'-26°40'शुक्रअर्यमन/भगझूला/मंचप्रजननमनुष्यमूषक (स्त्री)पित्त
12उत्तराफाल्गुनीसिंह-कन्यासूर्यअर्यमनअंजीर/शय्याचयनमनुष्यवृष (पु)पित्त
13हस्तकन्या 10°-23°20'चंद्रसवितृ/सूर्यहस्त/मुट्ठीहस्त-स्थापनीयदेवमहिष (पु)पित्त
14चित्राकन्या-तुलामंगलविश्वकर्मामोती/रत्नपुण्य-चयराक्षसव्याघ्र (स्त्री)पित्त
15स्वातीतुला 6°40'-20°राहुवायुमूंगा/तलवारप्रध्वंसदेवमहिष (स्त्री)वात
16विशाखातुला-वृश्चिकगुरुइंद्र-अग्निविजय-द्वारव्यापनराक्षसव्याघ्र (पु)कफ
17अनुराधावृश्चिक 3°20'-16°40'शनिमित्रकमल/दंडराधनदेवमृग (स्त्री)पित्त
18ज्येष्ठावृश्चिक 16°40'-30°बुधइंद्रकुंडल/छत्रआरोहणराक्षसमृग (पु)वात
19मूलधनु 0°-13°20'केतुनिरृतिजड़ें/अंकुशबर्हणराक्षसकुत्ता (पु)वात
20पूर्वाषाढ़ाधनु 13°20'-26°40'शुक्रअप/वरुणहाथी-दंत/पंखावर्चोग्रहणमनुष्यबंदर (पु)पित्त
21उत्तराषाढ़ाधनु-मकरसूर्यविश्वे देवहाथी-दंत/पटियाअप्रधृष्यमनुष्यनेवला (पु)पित्त
22श्रवणमकर 10°-23°20'चंद्रविष्णुतीन चरण/कानसंहननदेवबंदर (स्त्री)कफ
23धनिष्ठामकर-कुंभमंगलअष्ट वसुढोल/बांसुरीख्यापयित्रीराक्षससिंह (स्त्री)पित्त
24शतभिषाकुंभ 6°40'-20°राहुवरुणखाली चक्र/100 तारेभेषजराक्षसअश्व (स्त्री)वात
25पूर्वाभाद्रपदकुंभ-मीनगुरुअजैकपाततलवारेंयजमान-उद्यमनमनुष्यसिंह (पु)वात
26उत्तराभाद्रपदमीन 3°20'-16°40'शनिअहिर्बुध्न्यजुड़वां/पायावर्षोद्यमनमनुष्यगाय (स्त्री)कफ
27रेवतीमीन 16°40'-30°बुधपूषणमछली/मृदंगक्षीरधारादेवगज (स्त्री)कफ

वैदिक विवाह-मिलान: अष्टकूट प्रणाली

36-अंक प्रणाली — अवलोकन

अष्टकूट (आठ गुण) वर-वधू के जन्म नक्षत्र के आधार पर विवाह-योग्यता का परीक्षण करती है। अधिकतम 36 अंक; 18+ को स्वीकार्य, 24+ को उत्तम माना जाता है।

कूटअंकपरीक्षण का विषय
नाड़ी8स्वास्थ्य, संतान, जैविक अनुकूलता
भकूट7सम्बन्ध-बल, आर्थिक समृद्धि
गण6स्वभाव-मेल, दैनिक जीवन
मैत्री5मानसिक मेल, पारस्परिक सम्मान
योनि4शारीरिक-यौन अनुकूलता
तारा3दाम्पत्य-भाग्य, दीर्घायु
वश्य2प्रभाव और नियंत्रण
वर्ण1आध्यात्मिक विकास की समानता

नाड़ी कूट: जैविक अनुकूलता (8 अंक)

नाड़ी सर्वाधिक महत्वपूर्ण कूट है। 27 नक्षत्र तीन नाड़ियों में विभाजित हैं:

नाड़ी दोष सबसे गंभीर दोष है: जब वर और वधू की एक ही नाड़ी हो, नाड़ी दोष बनता है।

नाड़ी कूट सर्वाधिक 8 अंकों का कूट है — नाड़ी दोष, जब दोनों की एक ही नाड़ी हो, अष्टकूट का एकमात्र सर्वाधिक गंभीर दोष माना जाता है।

नाड़ीआयुर्वेदनक्षत्र
वात (आदि)वात-प्रकृतिअश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद
पित्त (मध्य)पित्त-प्रकृतिभरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा
कफ (अंत्य)कफ-प्रकृतिकृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, श्रवण, उत्तराभाद्रपद, रेवती

गण कूट: स्वभाव-मेल (6 अंक)

27 नक्षत्रों को तीन गणों में बांटा गया है:

देव गण (9 नक्षत्र): अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाती, अनुराधा, श्रवण, रेवती — संयत, धार्मिक, उदार

मनुष्य गण (9 नक्षत्र): भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद — व्यावहारिक, संतुलित

राक्षस गण (9 नक्षत्र): कृत्तिका, आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा — स्वतंत्र, तीव्र, अडिग

वर/वधूदेवमनुष्यराक्षस
देव650
मनुष्य560
राक्षस006

योनि कूट: शारीरिक अनुकूलता (4 अंक)

प्रत्येक नक्षत्र एक पशु-योनि (14 में से) से जुड़ा है। समान योनि = 4 अंक; शत्रु योनि = 0 अंक।

योनिपुरुष नक्षत्रस्त्री नक्षत्र
अश्वअश्विनीशतभिषा
गजभरणीरेवती
मेषकृत्तिकापुष्य
सर्परोहिणीमृगशिरा
श्वानमूलआर्द्रा
मार्जारआश्लेषापुनर्वसु
मूषकमघापूर्वाफाल्गुनी
वृषउत्तराफाल्गुनीविशाखा
महिषहस्तस्वाती
व्याघ्रचित्रापूर्वाभाद्रपद
मृगअनुराधाज्येष्ठा
बंदरपूर्वाषाढ़ाश्रवण
नेवलाउत्तराषाढ़ा—
सिंहधनिष्ठापूर्वाभाद्रपद

तारा कूट: नक्षत्र-दूरी (3 अंक)

वर के जन्म नक्षत्र से वधू के जन्म नक्षत्र तक गिनें। सम = शुभ, विषम = अशुभ।


नक्षत्र और मुहूर्त: शुभ समय का विज्ञान

7-प्रकार मुहूर्त वर्गीकरण

बृहत् पराशर होरा शास्त्र में 27 नक्षत्रों को 7 प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

प्रकारनक्षत्रसर्वश्रेष्ठ उपयोगवर्जित
ध्रुव (स्थिर)रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदविवाह, निर्माण, स्थायी अनुबंधयात्रा
चर (चल)पुनर्वसु, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषायात्रा, वाहन-क्रयस्थायी कार्य
उग्र (क्रूर)भरणी, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदशल्य-क्रिया, ऋण-वसूलीशुभ कार्य
मृदु (कोमल)मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवतीकला, प्रेम, अध्ययन, चिकित्सायुद्ध
तीक्ष्ण (तीव्र)आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूलविध्वंस; सकारात्मक कार्य वर्जितसभी शुभ कार्य
लघु (हल्का)अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजितव्यापार, वाणिज्य, धार्मिक विधि—
मिश्रकृत्तिका, विशाखाअग्नि-यज्ञ मात्र—

तारा बल: व्यक्तिगत नक्षत्र-चक्र

तारा बल मुहूर्त चयन का अत्यंत व्यावहारिक साधन है। जन्म नक्षत्र से उस दिन के नक्षत्र तक गिनें (1 से आरंभ करते हुए), फिर 9 का शेषफल लें:

स्थाननामफल
1जन्मअशुभ — टालें
2संपत् ✓धन-वृद्धि — शुभ
3विपत्विपत्ति — टालें
4क्षेम ✓कल्याण — शुभ
5प्रत्यक्बाधा — टालें
6साधन ✓सिद्धि — शुभ
7नैधनमृत्युतुल्य — टालें
8मित्र ✓मित्र-लाभ — शुभ
9परम मित्र ✓✓सर्वश्रेष्ठ — अत्यंत शुभ

उदाहरण: राहुल का जन्म नक्षत्र पुष्य (8वां) है। यदि आज श्रवण (22वां) है, तो गिनती: 22-8+1 = 15, 15÷9 का शेषफल = 6 (साधन) — शुभ।

पुष्य विरोधाभास: नक्षत्रों का राजा

पुष्य नक्षत्र — शनि द्वारा शासित, बृहस्पति द्वारा अधिष्ठित — सभी नक्षत्रों में श्रेष्ठ माना जाता है। गुरु-पुष्य योग (गुरुवार + पुष्य नक्षत्र) अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।

पुष्य नक्षत्र — सभी कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ, गुरु-पुष्य योग अत्यंत शुभ — फिर भी बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार विवाह के लिए पूर्णतः निषिद्ध है।

परंतु बृहत् पराशर होरा शास्त्र और बी.वी. रमण स्पष्ट रूप से निर्देशित करते हैं — पुष्य में विवाह नहीं करना चाहिए। कारण: शनि का स्वामित्व विवाह-बंधन में विलंब और कठिनाई लाता है।

अभिजित मुहूर्त: आपातकालीन उपाय

अभिजित मुहूर्त प्रतिदिन सौर मध्याह्न (सूर्योदय और सूर्यास्त का मध्य) के आसपास ~48 मिनट का होता है। यह सभी ग्रह-दोषों और नक्षत्र-दोषों को निष्फल कर देता है।

प्रतिबंध: जब चंद्रमा मकर राशि में 6°40' से 10°53'20' हो, अभिजित मुहूर्त वर्जित है।

अभिजित 28वां नक्षत्र है — मकर में 4°13'20" का एक लघु खंड — जिसे 'मुहूर्त का ब्रह्मास्त्र' कहते हैं। यह जन्मकुंडली या अष्टकूट में कभी प्रयुक्त नहीं होता।

पंचांग का तीसरा तत्व

पंचांग में 5 तत्व हैं:

  1. वार — सप्ताह का दिन
  2. तिथि — चंद्र-कला (30 में से)
  3. नक्षत्र — चंद्र-मंडल (27 में से) ← मुहूर्त में सर्वाधिक महत्वपूर्ण
  4. योग — सूर्य+चंद्र का योग
  5. करण — आधी तिथि

नक्षत्र मुहूर्त में सर्वाधिक शक्तिशाली संकेतक है।

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मनोवैज्ञानिक स्वभाव: तीन गण प्रकार

देव गण (9 नक्षत्र) — दिव्य स्वभाव

अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाती, अनुराधा, श्रवण, रेवती

देव गण व्यक्ति संयमी, धार्मिक और परोपकारी होते हैं। प्रिया का जन्म रेवती में है — वह स्वभाव से नर्म, कलाप्रिय और आध्यात्मिक है। देव गण भगवत्-भक्ति, सात्विक आहार और शांत जीवन शैली की ओर झुकते हैं।

विशेषताएं: सत्यवादी, उदार, न्यायप्रिय, आध्यात्मिक, सेवाभावी

मनुष्य गण (9 नक्षत्र) — मानवीय स्वभाव

भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद

मनुष्य गण व्यावहारिक और संतुलित होते हैं। राहुल का जन्म उत्तराफाल्गुनी में है — वह लक्ष्य-केंद्रित, परिश्रमी और पारिवारिक है। इनमें भोग और त्याग का संतुलन होता है।

विशेषताएं: व्यावहारिक, महत्वाकांक्षी, पारिवारिक, कला-प्रेमी, नेतृत्व-कुशल

राक्षस गण (9 नक्षत्र) — उग्र स्वभाव

कृत्तिका, आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा

राक्षस गण तीव्र, स्वतंत्र और अडिग होते हैं। ये व्यवस्था को चुनौती देते हैं और परिवर्तन के वाहक बनते हैं। इनकी शक्ति विध्वंस और पुनर्निर्माण में है।

विशेषताएं: दृढ़-संकल्पी, स्वतंत्र-विचार, क्रांतिकारी, तीव्र-भावुक, सत्य-अन्वेषी


27 नक्षत्रों के व्यक्तित्व-संक्षेप

अश्विनी — उपचार और गति

अश्विनी कुमारों द्वारा अधिष्ठित, यह नक्षत्र शीघ्रता, उपचार-शक्ति और प्रारंभिक उत्साह का प्रतीक है। जन्म नक्षत्र अश्विनी हो तो व्यक्ति स्वाभाविक चिकित्सक और साहसी होता है।

रोहिणी — सौंदर्य और संपन्नता

चंद्रमा की प्रिय पत्नी रोहिणी, सौंदर्य, भोजन, कृषि और भौतिक सुख का नक्षत्र है। ब्रह्मांड में सबसे सुंदर नक्षत्र — इसमें जन्मे व्यक्ति सौंदर्यबोध से परिपूर्ण होते हैं।

पुष्य — पोषण और वृद्धि

शनि-शासित, बृहस्पति-अधिष्ठित पुष्य पोषण, आशीर्वाद और आध्यात्मिक विकास का नक्षत्र है। कोई भी शुभ कार्य पुष्य में आरंभ करना फलप्रद होता है — सिवाय विवाह के।

मूल — जड़ें और परिवर्तन

निरृति द्वारा अधिष्ठित मूल, विघटन और पुनर्निर्माण का नक्षत्र है। यह 'गंडांत' नक्षत्र है — धनु के अंत और वृश्चिक-धनु संधि पर। इसमें जन्मे व्यक्ति जीवन में गहरे परिवर्तनों से गुजरते हैं।

श्रवण — श्रवण और ज्ञान

विष्णु द्वारा अधिष्ठित, श्रवण सुनने, सीखने और जोड़ने का नक्षत्र है। चंद्रमा के स्वामित्व में यह नक्षत्र ज्ञान-प्रसार और यात्रा का संकेत देता है।


सम्पूर्ण नक्षत्र × अष्टकूट संदर्भ तालिका

#नक्षत्रनाड़ीगणयोनि (पशु/लिंग)
1अश्विनीवातदेवअश्व/पु
2भरणीपित्तमनुष्यगज/पु
3कृत्तिकाकफराक्षसमेष/स्त्री
4रोहिणीकफमनुष्यसर्प/पु
5मृगशिरापित्तदेवसर्प/स्त्री
6आर्द्रावातमनुष्यश्वान/स्त्री
7पुनर्वसुवातदेवमार्जार/स्त्री
8पुष्यपित्तदेवमेष/पु
9आश्लेषाकफराक्षसमार्जार/पु
10मघाकफराक्षसमूषक/पु
11पूर्वाफाल्गुनीपित्तमनुष्यमूषक/स्त्री
12उत्तराफाल्गुनीपित्तमनुष्यवृष/पु
13हस्तपित्तदेवमहिष/पु
14चित्रापित्तराक्षसव्याघ्र/स्त्री
15स्वातीवातदेवमहिष/स्त्री
16विशाखाकफराक्षसव्याघ्र/पु
17अनुराधापित्तदेवमृग/स्त्री
18ज्येष्ठावातराक्षसमृग/पु
19मूलवातराक्षसश्वान/पु
20पूर्वाषाढ़ापित्तमनुष्यबंदर/पु
21उत्तराषाढ़ापित्तमनुष्यनेवला/पु
22श्रवणकफदेवबंदर/स्त्री
23धनिष्ठापित्तराक्षससिंह/स्त्री
24शतभिषावातराक्षसअश्व/स्त्री
25पूर्वाभाद्रपदवातमनुष्यसिंह/पु
26उत्तराभाद्रपदकफमनुष्यगाय/स्त्री
27रेवतीकफदेवगज/स्त्री

6 मुख्य तथ्य (GEO)

27 नक्षत्र 360° निरयण राशिचक्र के 13°20' के बराबर खंड हैं — यह संख्या चंद्रमा के 27.3-दिवसीय परिभ्रमण काल से सीधे व्युत्पन्न है।

विंशोत्तरी दशा 120 वर्षों का पूर्ण चक्र है — 9 ग्रह, प्रत्येक 3 नक्षत्रों के स्वामी, केतु के 7 वर्षों से लेकर शुक्र के 20 वर्षों तक।

पाद प्रणाली 27 × 4 = 108 उपखंड बनाती है — ठीक 108 नवांश के बराबर, जो वैदिक ब्रह्मांड-विज्ञान की पवित्र संख्या है।

नाड़ी कूट अष्टकूट का सर्वाधिक 8-अंकीय कूट है — नाड़ी दोष, जब वर-वधू की एक ही नाड़ी हो, वैदिक विवाह-मिलान का एकमात्र सर्वाधिक गंभीर दोष है।

पुष्य नक्षत्र — शनि-शासित, सभी कार्यों के लिए राजा — गुरु-पुष्य योग पर भी विवाह के लिए शास्त्रीय ज्योतिष में पूर्णतः निषिद्ध है।

अभिजित 28वां नक्षत्र है — मकर में केवल 4°13'20" — जन्मकुंडली या अष्टकूट में कभी प्रयुक्त नहीं, केवल 'मुहूर्त का ब्रह्मास्त्र' के रूप में।


सामान्य प्रश्न (FAQ)

नक्षत्र क्या होता है?

नक्षत्र वैदिक ज्योतिष में 27 चंद्र-मंडलों में से एक है। प्रत्येक नक्षत्र 13°20' का होता है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसे जन्म नक्षत्र या जन्म-तारा कहते हैं — यह व्यक्ति का स्वभाव, विंशोत्तरी दशा क्रम और विवाह-मिलान का आधार निर्धारित करता है।

27 नक्षत्र कौन से हैं?

27 नक्षत्र हैं — अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती। प्रत्येक 13°20' पर विस्तृत है।

जन्म नक्षत्र कैसे पता करें?

जन्म नक्षत्र जानने के लिए जन्म तिथि, समय और स्थान की कुंडली बनाएं। जन्म के समय चंद्रमा की सटीक निरयण स्थिति (लाहिरी अयनांश) देखें — वह जिस 13°20' खंड में हो, वही जन्म नक्षत्र है।

नक्षत्र और राशि में क्या अंतर है?

राशि सौर-गुणवत्ता दर्शाती है (30° प्रत्येक, 12 राशियां), जबकि नक्षत्र चंद्र-गुणवत्ता (13°20' प्रत्येक, 27 नक्षत्र) दर्शाता है। एक राशि में 2.25 नक्षत्र होते हैं। राशि व्यक्तित्व बताती है, नक्षत्र मानसिक स्वभाव और दशा क्रम।

विंशोत्तरी दशा क्या होती है?

विंशोत्तरी दशा 120-वर्षीय ग्रह-काल चक्र है। जन्म नक्षत्र से यह तय होता है कि पहली महादशा किस ग्रह की होगी। क्रम — केतु(7)→शुक्र(20)→सूर्य(6)→चंद्र(10)→मंगल(7)→राहु(18)→गुरु(16)→शनि(19)→बुध(17) = 120 वर्ष। जन्म के समय नक्षत्र-पाद से दशा का शेष-काल भी निर्धारित होता है।

नाड़ी दोष क्या होता है?

नाड़ी दोष अष्टकूट मिलान में सबसे गंभीर दोष है। जब वर-वधू दोनों की एक ही नाड़ी हो (वात/पित्त/कफ), नाड़ी दोष बनता है — 8 में से 0 अंक। यह स्वास्थ्य, संतान और वैवाहिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

पुष्य नक्षत्र विवाह के लिए वर्जित क्यों है?

पुष्य नक्षत्र सभी कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है — गुरु-पुष्य योग अत्यंत शुभ है। परंतु बृहत् पराशर होरा शास्त्र और बी.वी. रमण के अनुसार पुष्य में विवाह निषिद्ध है। शनि के स्वामित्व के कारण विवाह-बंधन कमजोर होता है।

नक्षत्र पाद क्या होता है?

प्रत्येक नक्षत्र 4 पादों में विभाजित है। एक पाद = 3°20' = एक नवांश खंड। 27 × 4 = 108 पाद = 108 नवांश। यदि कोई ग्रह जन्म राशि के समान नवांश राशि में हो, तो वर्गोत्तम योग बनता है — अत्यंत शुभ।

तारा बल क्या होता है?

तारा बल मुहूर्त में जन्म नक्षत्र से दिन के नक्षत्र की गिनती है। 9-स्थान चक्र में 2(संपत्), 4(क्षेम), 6(साधन), 8(मित्र), 9(परम मित्र) शुभ हैं; 1,3,5,7 अशुभ। मुहूर्त चयन में शुभ तारा बल आवश्यक है।

अभिजित नक्षत्र कब प्रयोग होता है?

अभिजित 28वां नक्षत्र है — मकर राशि में 6°40' से 10°53'20' तक। यह केवल मुहूर्त में प्रयुक्त होता है। सौर मध्याह्न के आसपास ~48 मिनट का अभिजित मुहूर्त सभी दोषों को निष्फल कर देता है — जन्मकुंडली या अष्टकूट में नहीं।


मुख्य बातें: 27 नक्षत्र, विम्शोत्तरी दशा और अष्टकूट मिलान

27 नक्षत्र वैदिक ज्योतिष की आत्मा हैं। वे केवल भाग्य-फल नहीं — वे आकाशीय मानचित्र हैं जो बताते हैं कि चंद्रमा की ऊर्जा किस प्रकार प्रवाहित होती है, व्यक्ति का स्वभाव कैसा होगा, जीवन में दशाएं कब और किस क्रम में आएंगी, और विवाह में कौन सा साथी उपयुक्त होगा।

बृहत् पराशर होरा शास्त्र (BPHS), के.एस. चरक ('नक्षत्र'), बी.वी. रमण और कमिला सटन ('द नक्षत्रास') — इन आचार्यों ने सहस्राब्दियों पुराने ज्ञान को संरक्षित किया है।

जन्म नक्षत्र जानना मात्र नहीं — उसके अर्थ को समझना वैदिक ज्योतिष की पहली सीढ़ी है।

अपनी जन्म-कुंडली और नक्षत्र देखें →


स्रोत: बृहत् पराशर होरा शास्त्र (BPHS) | के.एस. चरक — नक्षत्र | बी.वी. रमण — हिंदू प्रेडिक्टिव एस्ट्रोलॉजी | कमिला सटन — द नक्षत्रास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नक्षत्र क्या होता है?

नक्षत्र वैदिक ज्योतिष में 27 चंद्र-मंडलों में से एक है। प्रत्येक नक्षत्र 13°20' का होता है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसे जन्म नक्षत्र या जन्म-तारा कहते हैं — यह व्यक्ति का स्वभाव, विंशोत्तरी दशा क्रम और विवाह-मिलान का आधार निर्धारित करता है।

27 नक्षत्र कौन से हैं?

27 नक्षत्र हैं — अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती।

जन्म नक्षत्र कैसे पता करें?

जन्म नक्षत्र जानने के लिए जन्म तिथि, समय और स्थान की कुंडली बनाएं। जन्म के समय चंद्रमा की सटीक स्थिति (निरयण, लाहिरी अयनांश) देखें — वह जिस 13°20' खंड में हो, वही नक्षत्र आपका जन्म नक्षत्र है।

नक्षत्र और राशि में क्या अंतर है?

राशि सौर-गुणवत्ता दर्शाती है (30° प्रत्येक, 12 राशियां), जबकि नक्षत्र चंद्र-गुणवत्ता (13°20' प्रत्येक, 27 नक्षत्र) दर्शाता है। एक राशि में 2.25 नक्षत्र होते हैं। राशि व्यक्तित्व बताती है, नक्षत्र मानसिक स्वभाव और दशा क्रम।

विंशोत्तरी दशा क्या होती है?

विंशोत्तरी दशा 120-वर्षीय ग्रह-काल चक्र है। जन्म नक्षत्र से यह तय होता है कि पहली महादशा किस ग्रह की होगी। क्रम है — केतु(7)→शुक्र(20)→सूर्य(6)→चंद्र(10)→मंगल(7)→राहु(18)→गुरु(16)→शनि(19)→बुध(17) = 120 वर्ष।

नाड़ी दोष क्या होता है?

नाड़ी दोष अष्टकूट मिलान में सबसे गंभीर दोष है। जब वर-वधू दोनों की एक ही नाड़ी हो (वात/पित्त/कफ), तो नाड़ी दोष बनता है। इसे 8 में से 0 अंक मिलते हैं। यह स्वास्थ्य, संतान और वैवाहिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

पुष्य नक्षत्र विवाह के लिए वर्जित क्यों है?

पुष्य नक्षत्र सभी कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है — गुरु-पुष्य योग अत्यंत शुभ है। परंतु बृहत् पराशर होरा शास्त्र और बी.वी. रमण के अनुसार पुष्य में विवाह निषिद्ध है। इसे 'पुष्य विरोधाभास' कहते हैं — शनि के स्वामित्व के कारण यह विवाह-बंधन को कमजोर करता है।

नक्षत्र पाद क्या होता है?

प्रत्येक नक्षत्र 4 पादों में विभाजित है। एक पाद = 3°20'। 27 × 4 = 108 पाद = 108 नवांश। यदि कोई ग्रह जन्म राशि के समान नवांश राशि में हो, तो वर्गोत्तम योग बनता है जो अत्यंत शुभ होता है।

तारा बल क्या होता है?

तारा बल मुहूर्त में जन्म नक्षत्र से दिन के नक्षत्र की गिनती है। 9-स्थान चक्र में 2(संपत्), 4(क्षेम), 6(साधन), 8(मित्र), 9(परम मित्र) शुभ हैं; 1,3,5,7 अशुभ। मुहूर्त चयन में शुभ तारा बल आवश्यक है।

अभिजित नक्षत्र कब प्रयोग होता है?

अभिजित 28वां नक्षत्र है — मकर राशि में 6°40' से 10°53'20' तक। यह केवल मुहूर्त में प्रयुक्त होता है — जन्मकुंडली या अष्टकूट मिलान में नहीं। सौर मध्याह्न के आसपास ~48 मिनट का अभिजित मुहूर्त सभी दोषों को निष्फल कर देता है।

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